Saturday, 10 October 2015

डिजिटल ठगी

आजकल फेसबुक पर डिजिटल इंडिया के समर्थन में अपनी प्रोफाइल की फ़ोटो बदलने की भेड़चाल सी मची हुई है। फेसबुक के संस्थापक मार्क ज़ुकेरबर्ग यह अच्छी तरह से जानते हैं क़ि कैसे भारतीयो को भावनाओ में बहाकर उनसे कुछ भी करवाया जा सकता है।
इन भोले भले और हद से ज्यादा भावुक फेसबुक उपयोगकर्ताओं को तो शायद पता भी नहीं क़ि डिजिटल इंडिया के समर्थन और तिरंगे की आड़ में फेसबुक अपनी वेबसाइट internet.org का प्रचार कर रहा है। internet.org खुले आम  नेट निष्पक्षता के मानको का उल्लंघन करती है यानि क़ि आपके पास इंटरनेट तो होगा पर आप कुछ  ख़ास वेबसाइट ही देख पाएंगे और ये सभी यूज़र्स अप्रत्यक्ष रूप से इसी नेट निरपेक्षता के खिलाफ वोट कर रहे हैं।
देखा जाते तो डिजिटल इंडिया या किसी भी योजना का समर्थन करने की लिए फेसबुक पर फ़ोटो बदलने का क्या तुक बनता है। फिर यहाँ कोई ऐसा सर्वे भी नहीं हो रहा की इतने लोगो का समर्थन आएगा तो सरकार योजना पर आगे बढ़ेगी अन्यथा नहीं। बेहतर होता क़ि हम इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के व्यावसायिक हथकंडो को समझ पाते और प्रतिकात्मक देशभक्ति और दिखावेबाजी से ऊपर उठ कर सोच पाते।

जनसत्ता 10 अक्टूबर 2015 में भी प्रकाशित



Thursday, 1 October 2015

हमारे ये दोहरे मापदंड

अगर hypocrisy यानी क़ि डबल स्टैण्डर्ड यानी दोहरे मापदंड पर कोई अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित की जाए तो भारत निश्चित रूप से जीत का प्रबल दावेदार होगा।भ्रष्टाचार हमारे लिए तब तक ही बुरा है जब तक हम टेबल के इस तरफ हैं। टेबल के उस तरफ जाते ही बढ़ती महंगाई और परिवार के खर्चे याद आ जाते हैं। लाखों करोडो के घोटालो के लिए भ्रष्ट नेताओ को कोसने वाली जनता अपना काम निकलवाने के लिए 100-50 रुपये ऊपर से देने को गलत नहीं मानती।

ठीक वैसे ही पहले हम अपनी नदियों को माँ बनाते हैं फिर उनकी आरती करते हैं और फिर उनको ही प्रदूषित करते हैं। हिंदी फिल्मो के हीरो हेरोइन के लिए तालियां बजने वाले अधिकांश पेरेंट्स अपने बच्चों के अंतर्जातीय विवाह को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते।

बड़े गर्व से हम बताते है क़ि हमारी महान संस्कृति में स्त्री को देवी माना गया है। ठीक भी है अब भला देवियों का इस दुनिया में क्या काम इसीलिए तो हम बच्चियों को जन्म लेने से पहले ही मार देते हैं। बेटी बचाने की बातें #selfiewithdaughtor पर आकर रुक जाती हैं। पंजाब और हरियाणा का हाल देख कर समझ आता है क़ि समस्या गरीबी की नहीं बल्कि मानसिकता की है। बेहतर होता अगर हम उनको आम इंसान ही मानते।

रोड पर खड़े होकर आती जाती लड़कियो को छेड़ने वाले लड़के अपनी बहन के साथ ऐसा कुछ होने पर बर्दाश्त नहीं कर पाते। हर लड़की में अपनी गर्लफ्रेंड ढूँढने वाला भाई ही अपनी बहन के ब्वॉयफ्रेंड की सबसे ज्यादा धुलाई करता है।

खैर लिखने वाले तो लिखते ही रहेंगे। यहाँ किसे फर्क पड़ रहा है। शरीर नष्ट हो जाते है पर hypocrisy तो आत्मा की तरह अजर अमर है। लगता है यहाँ तो सब ऐसे ही चलता रहेगा।

जनसत्ता 2 अक्टूबर 2015 में भी प्रकाशित

http://epaper.jansatta.com/603025/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-02102015?show=touch#page/5/2


Tuesday, 22 September 2015

छत वाला क्रिकेट

बचपन में जब अपार्टमेंट की छत पर क्रिकेट खेलते थे तो सबसे ज्यादा झगड़ा इसी बात पर होता था की बॉल नीचे जायेगी तो कौन लेकर आएगा। दिन भर क्रिकेट खेलने में कभी उतनी थकान नहीं होती थी जितनी सीढिया उतरकर नीचे से बॉल लाने में। और इसलिए नियम ऐसे बनाये जाते थे क़ि बॉल अगर नीचे गयी तो बैट्समैन आउट तो होगा ही बॉल भी वही लेकर आएगा। बॉल तो खैर तब भी नीचे जाती ही थी और फिर शुरू होता था इंतज़ार रास्ते से गुजरने वाले किसी भले मानस का जो हमारी बॉल वापस छत पर फेक दे और खेल आगे बढे।

यह पोस्ट उन्ही जाने पहचाने या अनजाने भले व्यक्तियो या कहिये फरिश्तों की याद में जिन्होंने अपना एक कीमती मिनट देकर छत वाले क्रिकेट की परंपरा को बनाये रखने में योगदान दिया।

Wednesday, 9 September 2015

कुछ पुरानी यादें

चम्पक का यह दुर्लभ अंक स्कैन करके यहाँ डाल रहा हूँ। शायद इससे कुछ पुराणी यादें ताज़ा हो जाए।
चम्पक अगस्त 1980

Friday, 12 June 2015

खोखला राष्ट्रवाद और फर्जी धर्मनिरपेक्षता

भारतीय सन्दर्भ में राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता दो ऐसे शब्द है जिनको न केवल गलत अर्थ में लिया गया है बल्कि खुल कर दुरूपयोग भी किया गया है। आज़ादी के बाद से ही भारत के दो प्रमुख राजनैतिक दलों ने तथाकथित धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद के नाम पर जनता को अच्छा ख़ासा उल्लू बनाया है और अब तक बना रहे है। यह ज़रूर है की Self certified राष्ट्रवादी पार्टी की तुलना में Self certified धर्मनिरपेक्ष पार्टी ने अधिक समय तक जनता को मूर्ख बनाये रखा। राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष होने का सर्टिफिकेट देने का खेल इस कदर ज़ारी है कि अगर आप इन पार्टियो की नीति, कार्यक्रम, भ्रष्टाचार, घोटाले तथा अपराधीकरण या और किसी भी विषय पर आलोचना करेंगे तो तुरंत ही आप पर देशद्रोही या सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगा दिया जाएगा।

धर्मनिरपेक्षता का भारतीय स्वरुप धर्मनिरपेक्षता के मूल स्वरुप से इस प्रकार भिन्न है कि जहाँ उसमे धर्म एवं राज्य को पूरी तरह अलग रखा गया है वहीँ भारत में सभी धर्मो को एक जैसा सम्मान देने के नाम पर अर्थ का अनर्थ कर दिया गया है। इसी के चलते सार्वजनिक जीवन में धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग बेरोकटोक ज़ारी है। सरकारी कार्यक्रमों का प्रारम्भ दीप प्रज्वलित करके करना, भूमि पूजन, हज सब्सिडी आदि कुछ ऐसे उदाहरण है जिससे पता चलता है की राज्य द्वारा सभी धर्मी को खुश करने के चक्कर में मूल धर्मनिरपेक्षता तो कहीं खो ही गयी है। आये दिन विभिन्न धमो के अनुयायियों में यह होड़ लगी रहती है की कौन अपने धार्मिक उत्सवो का ज्यादा भव्य प्रदर्शन करता है फिर भले ही उससे आम जन जीवन और सार्वजनिक परिवहन ठप्प पड़ जाए। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह सभी परम्पराए हमारी धर्मनिरपेक्ष पार्टी के सत्ता में रहते हुए ही शुरू हुई है। यह तो भला हो हमारी न्यायपालिका की सक्रियता का वर्ना इन्होने तो धार्मिक आधार पर आरक्षण भी लागू कर ही दिया था।

सैद्धांतिक रूप से भले ही धर्म को व्यक्तिगत मामला माना गया हो पर जिस तरह सभी धर्मो के मध्य धार्मिक आडम्बरो के प्रदर्शन की होड़ मची हुई है ऐसे में धर्म को सार्वजनिक जीवन से अलग रख पाना नामुमकिन ही प्रतीत होता है। इसी होड़ का ही परिणाम है कि हमारे शहरों में अस्पताल और स्कूलों से ज्यादा मंदिर, मस्जिद दिखाई देते हैं। धार्मिक आस्था का मामला बताकर आप कहीं भी किसी भी जगह का अतिक्रमण कर सकते है। एक बार आपने वहां अपने भगवान् स्थापित कर दिए तो फिर मज़ाल है किसी सरकार की जो आपको वहां से हटाकर दिखाए। गावों में घर घर में शौचालय हो न हो, जगह जगह धार्मिक स्थल आपको अवश्य मिल जायेंगे। अब ऐसे में देश तरक्की करे भी तो कैसे? देखा जाए तो एक धर्म।पर गठित राष्ट्र(जैसे पाकिस्तान) और भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में अंतर बस इतना है कि राज्य के नीति निर्धारण में पहली स्थिति में एक ही धर्म की मनमानी चलती है जबकि दूसरी स्थिति में सभी धर्मो की। इस प्रकार ये दोनों ही स्थितियां सामान रूप से लोकतंत्र के लिए खतरा है।

हज सब्सिडी की प्रतिक्रया स्वरुप तीर्थ यात्रा पर सब्सिडी देने की मांग और गीता के साथ साथ स्कूलों में अन्य धर्मो के साहित्य को पढाये जाने की मान उठाना धर्मनिरपेक्षता की इस विकृत परिभाषा का ही दुष्परिणाम है। राज्य को धर्म से अलग न रखने और एक सम्प्रदाय के तुष्टिकरण की नीति के चलते पारस्परिक साम्प्रदायिक सदभाव पर नकारात्मक असर पड़ा है। फिल्म पीके का विरोध, सलमान रुश्दी का बहिष्कार और उनकी पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगाना, तसलीमा नसरीन का पलायन तथा नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या आदि से साबित होता है की कैसे राज्य की विवशता ने सभी सम्प्रदायों को असहिष्णु एवं उग्र होने के लिए प्रोत्साहित ही किया है।  आज बढती हुई धार्मिक कट्टरता, रुदिवादिता, पिछड़ापन आदि से मुक्ति पाने का यही उपाय है कि राज्य को धर्म से और सार्वजनिक जीवन को धार्मिक प्रतीकों और प्रदर्शनों से पूरी तरह अलग रखा जाए। इस तरह की सार्थक धर्मनिरपेक्षता अपनाने के लिए जो राजनैतिक इच्छाशक्ति चाहिए,  कम से कम अभी तो उसका अभाव ही दिखता है।

अब बात करते है राष्ट्रवाद की। राष्ट्रवाद के भारतीय संस्करण के साथ समस्या यहाँ है कि स्वयं को राष्ट्रावादी कहलाने वाली पार्टी ने इसे काफी हद तक हिंदुत्व से जोड़ दिया है। मुझ जैसे नास्तिक के लिए तो खैर इस संकुचित राष्ट्रवाद में कोई जगह ही नहीं है। इसका नतीजा यह निकला है कि जो समय और उर्जा भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, अशिक्षा, गरीबी, कुपोषण जैसी चुनोतियों से लड़ने में लगनी चाहिए थी वह प्राचीन संस्कृति के गुडगान, राम मंदिर जैसे मुद्दों में उलझ कर रह गयी। एक सीमा तक यह राष्ट्रवाद फर्जी धर्मनिरपेक्षता की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न हुआ पर आज देश के लिए धर्मनिरपेक्षता के समान ही घातक है।

परन्तु इस राष्ट्रवाद की भी अपनी सीमाएं है जो प्रतीकात्मक मुद्दों से कभी उपर नहीं उठ पाया।वरना क्या कारण है आज भी देश में एक समान नागरिक संहिता लागू नहीं हो पायी है? क्यूँ सामाजिक विषयों का नियंत्रण दो हज़ार साल पुराने दकियानूसी, रुढ़िवादी और वर्त्तमान में अप्रासंगिक हो चुके धर्मग्रंथों को सोंप दिया गया है? खुद को देश का सच्चा रक्षक आमने वाले इन लोगो के सत्ता में होने पर भी न तो पकिस्तान की तरफ से गोलीबारी कम हुई और ना ही चीन की तरफ से दादागिरी। हाल ही में हुआ भारत बांग्लादेश सीमा समझौते ने, जिसके लिए पिछली सरकार को देशद्रोही की संज्ञा दे दी गयी थी, इनके राष्ट्रवाद के ढोंग की पोल खोल दी है। हाँ जैसा मैंने पहले कहा धर्मनिरपेक्षता के समान ही राष्ट्रवाद का प्रयोग भी वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए होता रहा है।

वैसे भी हमारी महान संस्कृति के नाम पर धर्म की जो पट्टी लोगो को पढाई जाती है उससे समाज का कोई भला करने के स्थान पर उसे पीछे ही धकेला है। तर्कशीलता और रचनात्मकता का विकास ना करके लोगो को रूढ़िवादी ही बनाया है। अपनी महान संस्कृति का ढोल पीटना, स्वयं को जगतगुरु बताकर दम्भ भरना तथा वैज्ञानिक अविष्कारों का सन्दर्भ पौराणिक ग्रंथों में दिखाकर उसका श्रेय लेना अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनना तो है ही वैश्विक स्तर पर हमें हंसी का पात्र भी बनाता है।

सभी जानते हैं क़ि इस महान संस्कृति के होते हुए भी हम हज़ारो सालो से विदेशी आक्रमण झेलते रहे, जातिप्रथा के नाम पर समाज बंटा रहा और आज भी हम देश की एक बड़ी आबादी की बुनियादी आवश्यकताएं पूरी करने में असमर्थ है। ऐसे में खुद को विश्वगुरु का दर्ज देना झूठी आत्मसंतुष्टि तो दे सकता है पर गरीबी और भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार (जो मेरे अनुसार इस समय देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है) को ख़त्म करना ही सही अर्थ में राष्ट्रवाद है। परन्तु इस पर हमारी स्वप्रमाणित राष्ट्रवादी पार्टी का कभी ध्यान नहीं गया। शायद इसलिए कि भ्रष्टाचार की जड़ें हमारी इसी दान दक्षिणा और चढ़ावे वाली महान संस्कृति में रही हैं। जहाँ अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए भगवन को भी 10, 20 रूपए की रिश्वत देना सामान्य बात हो वह भ्रष्टाचार न करने की प्रेरणा भला कहाँ से मिले?  ग्लोबल हंगर रिपोर्ट के अनुसार भूखमरी के मामले में हम पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे है। क्या लोगो को जीवन यापन की बुनियादी ज़रूरते पूरी करना और भूखमरी तथा कुपोषण से बचाना कथित राष्ट्रवादियों की प्राथमिकताओं में नहीं होना चाहिए?

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता की संकीर्ण परिभाषाओं को पीछे छोड़कर राष्ट्र की वास्तविक समस्याओं के समाधान में अपना योगदान दे। उसके लिए हमें बॉर्डर पर जाकर दुश्मनों से लड़ने की आवश्यकता नहीं है। हम व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदार रहकर भी भारत को भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र बनाने में अपना योगदान दे सकते है। इसके साथ ही हमें इन फर्जी राष्ट्रवादियों और धर्मनिरपेक्षो से बचने की भी ज़रूरत है।

Copyright © Anil Hasani

Wednesday, 10 June 2015

केवल मैगी पर पाबंदी क्यों?

जिस तत्परता के साथ केंद्र सरकार और राज्य सरकारो ने मैगी पर प्रतिबन्ध लागाया है क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि इतनी ही तत्परता सिगरेट, तम्बाकू और शराब को प्रतिबंधित करने में भी दिखाई जायेगी।

अभी बहस इस बात पर चल रही है कि सिगरेट के पैकेट के 80% भाग पर चेतावनी छपी जाए या 85% भाग पर।  यदि मात्र चेतावनी पढ़कर ही लोग नशा करना छोड़ देते तो भारत कब का नशा मुक्त राष्ट्र बन चूका होता।अगर वास्तव में सरकार की मंशा लोगो के स्वास्थ्य को लेकर इतनी ही नेक होती तो बजाय चेतावनी के इन नशीले पदार्थों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती।

दरअसल इनसे प्राप्त होने वाला मोटा राजस्व ही सरकार को कड़े कदम उठाने से रोकता है। पर इन व्यसनों के सेवन से होने वाली बीमारियों के इलाज पर जो बेहिसाब खर्चा होता है क्या उसका कोई हिसाब है? और फिर अस्वस्थ मानव संसाधनों का निर्माण कर हम किस प्रकार आर्थिक महाशक्ति  बनने का दावा कर सकते हैं। शायद सरकार यह मानती है की सिगरेट और शराब मैगी से कम खतरनाक है।

 Also published on editorial page of Hindustan newspaper dated 10.06.2014 and jansatta Newspaper dated 12.06.2015

http://epaper.jansatta.com/519585/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-12062015#page/6/2



Saturday, 30 May 2015

धर्म और ईश्वर मुक्त संसार

इस संसार में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों में निसंदेह मनुष्य को सबसे बुद्धिमान प्राणी माना जाता है। पर क्या वास्तव में ऐसा है? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है क्योंकि हमने आज तक किसी जानवर को अपनी जरुरत पूरी करने के लिए किसी पत्थर पर माथा टेकते नहीं देखा और न ही कोई जानवर किसी दुसरे को इस आधार पर अपने से अलग समझता है कि वह किसी विशिष्ट सत्ता में आस्था रखता है। हमने कभी नहीं देखा कि कोई बन्दर किसी दुसरे बन्दर को या कोई कुत्ता किसी दुसरे कुत्ते को अपनी आस्था के खिलाफ बताकर मारता हो। यह काम तो मनुष्य जैसा बुद्धिमान, तार्किक सोच रखने वाला प्राणी ही कर सकता है। वास्तव में मनुष्य के अलावा कोई अन्य प्राणी आस्था जैसी किसी चीज़ में कभी उलझता ही नहीं है और ना ही उलझने की ज़रूरत महसूस करता है।

मानव जाति के इतिहास में आज तक युद्ध, भूकंप, बाढ़, सुनामी आदि से उतने लोग नहीं मरे जितने धर्म और ईश्वर के नाम पर मरे है। फिर भी हम यह अक्सर सुनते है धर्म इसान क अच्छा बनाता है, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना आदि आदि। जबकि वास्तविकता यह है की धर्म ही सबसे जयादा नफरत फैलाता है।

जहाँ तक नैतिक मूल्यों का प्रश्न है, एक नास्तिक होने के नाते मैं यह कह सकता हूँ की धर्म का नैतिकता से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। अलबत्ता धार्मिक आस्था रखने वालो को अनैतिकता के मार्ग पर चलते हुए हम सबने देखा ही होगा क्यूंकि उनको पता होता है कि बुरे से बुरा काम भी करने पर भी भगवान के सामने मत्था टेक कर प्रायश्चित कर लिया जायेगा। वैसे भी अगर कोई व्यक्ति मात्र स्वर्ग प्राप्ति के लालच में या भगवान के डर के कारण अच्छा बन कर रहे तो वह अच्छाई भी तो खोखली ही हुई।

यदि गंभीरता से सोचा जाये तो देश में फैले इस भ्रष्टाचार के पीछे कहीं हमारी दान, दक्षिणा और चढ़ावे की संस्कृति ही तो ज़िम्मेदार नहीं? जहाँ लोगो को यह सिखाया जाता हो कि गंगा में एक डुबकी मारने से सारे पाप धुल जाते हैं वहां भला कोई पाप करने में क्यों संकोच करेगा। अब समय आ गया है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के दिमाग में जन्म से ही धर्म का ज़हर ना भरे। बच्चों को अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करने के लिए प्रेरित करे और उन्हें स्वयं यह तय करने दे कि वह धर्म या ईश्वर में विश्वास रखे या नहीं।

और अंत में शहीदे आज़म भगत सिंह द्वारा लिखा गया यह ऐतिहासिक लेख जिसे सभी को एक बार अवश्य पढ़ना एवं समझना चाहिए।

http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=879&pageno=1

Note- किसी की भावनाओ को आहत करना मेरे इस लेख का उद्देश्य कतई नहीं है। मैं तो भारत के संविधान में उल्लेखित उस मौलिक कर्त्तव्य का पालन कर रहा हूँ जो हमे वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने को कहता है।

Tuesday, 19 May 2015

प्रोटोकॉल के नाम पर



प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ दौरे पर बस्तर के कलेक्टर द्वारा धूप का चश्मा लगाये पीएम  की आगवानी करने पर प्रशासन विभाग द्वारा उनको नोटिस देना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बताता है की आज भी किस प्रकार उच्च नौकरशाही और राजनैतिक प्रधानो पर ओपनिवेशिक मानसिकता हावी है। किसी भी अधिकारी का मूल्यांकन उसके कर्त्तव्य पालन तथा सत्यनिष्ठ से होना चाहिए ना कि प्रोटोकॉल के नियमो पर। अखिल भारतीय सेवाओं के पद की गरिमा सम्बन्धी जिन आचरण नियमो का हवाला दिया जा रहा है वे स्वभाव से ही अस्पष्ट है तथा उसमे भी कही चश्मे का कोई ज़िक्र नहीं है।

वास्तव में सारी समस्या की जड़ में ये प्रोटोकॉल ही है जो कार्य निष्पादन के स्थान पर यह देखता है की छोटा अधिकारी बड़े अधिकारी के सामने कैसे आया या बड़ा अधिकारी मंत्री के समक्ष कैसे पेश आया और इन सारी औपचारिकताओं में वास्तविक कार्य पीछे छूट जाते है। सोचने वाली बात है कि यदि कोई कलेक्टर अपने क्षेत्र के दौरे पर है तो स्वाभाविक है की वह उसके अनुकूल पोशाक पहनकर ही घूमेगा। अब यदि ऐसे में कोई ‘माननीय’ उससे मिलने आ जाये तो क्या वह एक जोड़ी कपडे साथ में रखे ताकि प्रोटोकॉल के नियमो का पालन हो सके।

अब समय आ गया है कि हम इन ओपनिवेशिक परम्पराओं तथा प्रतीकात्मक मुद्दों से उपर उठकर अपना समय एवं उर्जा वास्तविक कार्य निष्पादन पर लगाये। वैसे भीं जब नौकरशाह और राजनेता दोनों ही लोक सेवक है तो उनके मध्य कैसा प्रोटोकॉल।

जब हम सुनते है कि प्रधानमन्त्री जी प्रोटोकॉल तोड़कर फलाने राष्ट्र के प्रमुख से मिले या जनता के बींच पहुच गए तब हम उनपर गर्व करते है, इसकी सराहना करते है पर जब कोई अधिकारी प्रोटोकॉल तोड़े तो इतना हंगामा किसलिए भाई? और जहाँ तक आचरण नियमो में उल्लेखित पद की गरिमा का प्रश्न है तो भला धूप का चश्मा लागाने से या किसी किसी खास रंग की शर्ट पहनने से पद की गरिमा कैसे प्रभावित हो सकती है। पद की गरिमा तो उन बेतुके बयानों से प्रभावित होती है हमारे सांसद, मंत्री सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिए यहाँ वहां देते फिरते है।

Also published on editorial page of Hindustan dated 19.05.2015

 http://epaper.livehindustan.com/story.aspx?id=305434&boxid=29167424&ed_date=2015-05-19&ed_code=1&ed_page=10




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Wednesday, 13 May 2015

Magic of 1990s काश वो दिन लौट आते

उन सभी के लिए जिन्होंने अपना बचपन 1990-2000 के बींच गुज़ारा है।

कैडबरी  चॉकलेट का एक पुराण विज्ञापन अभी कुछ दिन पहले यूट्यूब पर देखा। उसमे क्रिकेट मैच चल रहा है। लड़का छक्का मारकर शतक पूरा करता है दर्शक दीर्घा में बैठी लड़की जो शायद उसकी गर्लफ्रैंड है, खुशी के मारे कुछ अलग तरह का लेकिन मज़ेदार सा डांस करती हुई स्टेडियम में आती है। बैकग्राउंड में शंकर महादेवन की आवाज है। यह विज्ञापन टीवी पर उन दिनों आता था जब बहुत ज्यादा चैनल नही होते थे और ज्यादातर घरों में तो सिर्फ दूरदर्शन ही चलता था। बचपन मे टीवी पर मैच देखते हुए हर ओवर के बाद जाने कितनी ही बार यह विज्ञापन देखा होगा। तब पता नही था कि जो विज्ञापन मजबूरी में देखने पड़ते हैं कभी इतने सालों बाद फिर यूट्यूब पर देखकर इतना अच्छा लगेगा। अगर आपका बचपन भी 1990-2000 के बीच बीता है तो यकीनन 42 सेकंड का यह विज्ञापन आपको पूरे बचपन की सेर करा देगा।

1990 का दशक। कुछ तो खास बात थी उन दिनों में। आर्थिक मोर्चे पर वैश्वीकरण और निजीकरण की हवा चल रही थी। भारत 1991 के आर्थिक संकट से धीरे धीरे बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। सामाजिक स्तर पर जहां नए मूल्य स्थापित होने की प्रक्रिया जारी थी तो पुराने मूल्यों को संजोए रखने की कोशिश भी चल रही थी। तथाकथित मध्यम वर्ग अपना दायरा बाद रहा था। स्कूल में पढ़ाया जाता था कि भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। अब भी शायद यही पढ़ाते हैं। कुछ चीजें सचमुच वक्त के साथ नही बदलती। खैर हम बच्चों को इन बातों से क्या लेना देना था। हमारा तो अर्थशास्त्र का ज्ञान सिर्फ यहीं तक सीमित था कि स्कूल आने जाने के लिए मिलने वाले बस के भाड़े में से बचत कैसे की जाए।

वो दिन जब टीवी चैनल कम थे और मनोरंजन ज्यादा था। जब मोबाइल और इंटरनेट के बिना भी कम्युनिकेशन होता था। जब गर्मिया बिना एयर कंडीशनर के निकल जाती थी और सर्दिया बिना हीटर के। जब फोटोग्राफ Kodak के कैमरे से लिए जाते थे, एक एक फोटो किफायत से खींचा जाता था और मोबाइल या फेसबुक पर नहीं बल्कि अपने निजी एल्बम में रखे जाते थे। जब घर में कलर टीवी होना तथा टेलीफोन कनेक्शन होना सम्पन्नता का प्रतीक समझा जाता था। टेलीफोन नंबर के साथ PP लगा होना तो बड़ी सामान्य बात थी। जब सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल में लाइन में लग कर टिकट लेकर और पंखे की हवा और मूंगफली खाते हुए फ़िल्म का मज़ा लिया जाता था जहाँ कोई गार्ड आपको घर से लाया हुआ खाने पीने का सामान अंदर ले जाने से रोकता नहीं था और अंदर भी आपको दस गुना कीमत पर सामान बेचकर कोई लूटता नही था। आज पूंजीवाद की देन मल्टीप्लेक्स के सामने हम शायद बेबस हो चुके है। जब पूरा परिवार एक स्कूटर पर समां जाता था और जब केवल किसी खास (बेहद खास) मौके पर ही बाहर रेस्टॉरेंट जाकर खाने का कार्यक्रम बनता था।

यूट्यूब नही था और अपनी पसंद के गाने सुनने और पसंदीदा फिल्मे देखने के लिए वीसीआर और टेप रिकॉर्डर का ही आसरा था तब। वीडियो गेम और कॉमिक्स के दिन। मई की तेज़ धुप में जब घर से बाहर निकलना संभव न हो तब चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव की कॉमिक्स का ही सहारा होता था। पापा हमको पढ़ने के लिए चम्पक, बालहंस, नंदन आदि पत्रिकाएं तो लेकर देते थे पर पता नही क्यों कॉमिक्स पढ़ना अच्छे बच्चों की आदत नही मानी जाती थी। बड़े बुजुर्ग तो कॉमिक्स को ऐसी हेय दृष्टि से देखते थे मानो कोई अश्लील साहित्य हो। इसलिए हमेशा कॉमिक्स पढ़ते हुए कुछ अपराधबोध सा महसूस होता था। उन सभी किताबों और कॉमिक्स का अच्छा खासा कलेक्शन मेरे पास इकठ्ठा हो गया था जो अभी तक संभाल कर रखा हुआ है। पीले पड़ते हुए कागजों में से अभी भी वो बचपन वाली खुशबू आती है। इधर आजकल के बिचारे अभिभावक चाहते हैं कि बच्चा मोबाइल और कंप्यूटर छोड़ कर कुछ तो पढ़े। कोर्स की किताबें न सही कुछ कहानी कविता या कॉमिक्स ही पढ़े बस पढ़ने की आदत तो डाले।

वीडियो गेम से लेकर कॉमिक्स और यहाँ तक कि साइकिल भी घंटो के हिसाब से किराये पर मिलती थी। मुझे याद है जब हम कभी एक दिन के किराये पर वीडियो गेम लाते थे तो हैम सभी भाई अपना खाने पीने और दैनिक क्रियाकलापो का कार्यक्रम इस प्रकार निर्धारित करते थे कि 24 घंटो में एक एक मिनट का पैसा वसूल सके। वीडियो गेम के साथ मज़ेदार बात ये थी कि जब आप नया नया गेम खेलना सीखते हैं तो रिमोट के साथ खुद भी दाएं बाएं होते रहते हैं। शरीर की इन हलचल से ही पता चल जाता था कि कौन नोसिखिया है और कौन पक्का खिलाड़ी है।

केबल टीवी तो खैर गर्मियों की छुट्टियों में ही नसीब होती थी (ऐसी मान्यता थी की इससे पढाई पर बुरा असर पड़ता है)। बाकी साल तो दूरदर्शन देख कर ही निकलता था। अब समझ आया कि दूरदर्शन का वह समय टीवी सीरियलों की गुणवता की दृष्टि से स्वर्णिम युग था। उस समय प्रसारित होने वाले कार्यक्रम जैसे ब्योमकेश बक्शी, फ्लॉप शो, श्रीमान श्रीमती, मालगुडी डेज, जंगल बुक आदि की अपनी एक क्लास थी। यह वो वक्त था जब साक्षरता अभियान पर केंद्रित तरंग जैसे कार्यक्रम से भी मनोरंजन हो जाता था। आज सिर्फ फिल्मो के ही कम से कम 20 चैनल आते है जिन पर रोज़ाना सैकड़ो फिल्में आती है पर जो इंतज़ार तब दूरदर्शन पर सप्ताह में एक बार आने वाली फ़िल्म के लिए होता था वो आज नदारद है। और फिर ' रूकावट के लिए खेद है' को भला कौन भूल सकता है।

जब बिना इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स के भी ज़िन्दगी बहुत आसान हुआ करती थी। जब किसी भी वस्तु को खरीदने का निर्णय उसकी कीमत और अपनी ज़रूरत के आधार पर लिया जाता था न की उसकी ब्रांड वैल्यू पर। उन दिनों भारत में उपभोक्तावादी संस्कृति पूरी तरह से विकसित नहीं हुई थी। हर पीढ़ी अपने बचपन का समय को सबसे यादगार और विशिष्ट मानती है शायद। 1990 के दशक को खास समझना हमारी पीढ़ी की खुशफहमी ही हो शायद। बस यही सोचता हूँ कि ऐसे कितने लोग होंगे जो आज अपनी सारी दौपत कुर्बान कर अपने बचपन का एक दिन फिर से जीना चाहेंगे बशर्ते ऐसा मुमकिन हो। कुछ तो होंगे ही शायद।

जनसत्ता 14,08,2017 में प्रकाशित

http://www.jansatta.com/duniya-mere-aage/jansatta-article-about-golden-past-time/402099/





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Thursday, 7 May 2015

अपराध की उम्र

किशोर न्याय कानून में होने वाले संशोधन के अंतर्गत जघन्य अपराधो के लिए आयु सीमा 18 से घटाकर 16 करने के प्रस्ताव को लेकर बहस जारी है। विभिन्न सामाजिक संगठन बाल अधिकारों तथा उससे सम्बंधित अंतर्राष्ट्रीय संधियों का हवाला दे रहे हैं। पर इन्ही संधियों पर हस्ताक्षर करने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अनेक यूरोपीय देशो में भी अपराध की बर्बरता और गंभीरता को देखते हुए 18 वर्ष से कम आयु वालो पर भी सामान्य अदालत में मुक़दमा चलने का प्रावधान किया गया है।

यह समझना मुश्किल है कि जो व्यक्ति बलात्कार जैसा अपराध करने की शारीरिक एवं मानसिक परिपक्वाता रखता है उसे किस आधार पर मासूम किशोर माना जा सकता है। केवल इसलिए कि वह 18 वर्ष की निर्धारित आयु सीमा से कुछ दिन या महीने छोटा है।

बेहतर यह होगा कि एक न्यूनतम आयु सीमे जैसे 10 या 12 वर्ष( जैसा की अमेरिका तथा फ्रांस आदि देशो में हैं) तथा एक ऊपरी सीमा जैसे 18 वर्ष निर्धारित की जाए। अब इस आयु वर्ग में आने वाले अपराधियो पर किये गए अपराध की गंभीरता के आधार पर मुक़दमा चले।

देखा जाए तो किसी भी अपराध की प्रवृति के आधार पर ही यहाँ तय किया जा सकता है कि दोषी पर मुक़दमा सामान्य न्यायलय में चलना चाहिए या किशोर न्यायलय में। अपराधी को दंड देने का एक उद्देश्य संभावित अपराधियों में कानून का भय पैदा करना भी है। वर्ना फिर कोई साढ़े सत्रह साल का 'मासूम' बलात्कार एवं हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बाद भी किशोरे कारावास में अधिकतम 3 साल गुजार कर खुले आम घूमता रहेगा और न्याय व्यवस्था का मजाक उडाता रहेगा।
Also published on editorial.page of Jansatta and Hindustan newspaer of 30.04.2015

http://epaper.jansatta.com/490852/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-01052015?show=touch#page/6/2




http://epaper.livehindustan.com/story.aspx?id=266300&boxid=84607796&ed_date=2015-05-01&ed_code=1&ed_page=10




Wednesday, 6 May 2015

सब्सिडी किसके लिए

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा समर्थ लोगो से रसोई गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील करना ऊपरी तौर पर तो सराहनीय प्रतीत होता है परन्तु उसका व्यापक प्रभाव पड़ने की उम्मीद कम ही है। कारण कि जब जनता सांसदों एवं मंत्रियों को संसद की कैंटीन, आलीशान बंगले , टेलीफोन भत्ता तथा वीआईपी कोटे में रेल यात्रा इत्यादि में बिना हिचक सरकारी धन का इस्तेमाल करते हुए देखती है तो उनसे सब्सिडी छोड़ने की उम्मीद करना व्यर्थ ही है। राजस्व घाटे को कम करने की सोच अच्छी तो है पर एक आम आदमी के नज़रिए से देखा जाए तो उसे सांसदों, विधायको द्वारा अच्छी खासी तनख्वाह होने के बावजूद सरकारी खर्चे पर सुख भोगने के सामने स्वयं ली जाने वाली गैस सब्सिडी नगण्य ही मानी जाएगी.

वैसे भी हमारी जनता प्रत्येक क्षेत्र में 'माननीयो' का अनुसरण करती है तो मुफ्तखोरी में भला कैसे पीछे रह सकती है. हमारे नेतागण जिस प्रकार से अपनी सहूलियत के लिए आयकर दाताओं का पैसा फूकते है, वे जनता को सब्सिडी छोड़ने का आग्रह करने का नैतिक अधिकार खो चुके हैं। 

प्रधानमंत्री जी का जनता को गैस सब्सिडी छोड़ने की नसीहत देना और स्वयं संसद की कैंटीन का शाही खाना खाकर 29 रूपए का बिल भर कर चलते बनना अपने आप में विरोधाभासी है। भ्रष्टाचार के सामान ही उत्तरदायित्व की भावना भी सदैव उच्च स्तर से निम्न स्तर की तरफ प्रवाहित होती है l उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति अपनी कथनी से नहीं बल्कि करनी से ही जन मानस को सब्सिडी छोड़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

Also Published on editorial page of Jansatta Newspaper dated 05.05.2014 
http://epaper.jansatta.com/493218/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-05052015#page/6/2