Saturday, 30 May 2015

धर्म और ईश्वर मुक्त संसार

इस संसार में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों में निसंदेह मनुष्य को सबसे बुद्धिमान प्राणी माना जाता है। पर क्या वास्तव में ऐसा है? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है क्योंकि हमने आज तक किसी जानवर को अपनी जरुरत पूरी करने के लिए किसी पत्थर पर माथा टेकते नहीं देखा और न ही कोई जानवर किसी दुसरे को इस आधार पर अपने से अलग समझता है कि वह किसी विशिष्ट सत्ता में आस्था रखता है। हमने कभी नहीं देखा कि कोई बन्दर किसी दुसरे बन्दर को या कोई कुत्ता किसी दुसरे कुत्ते को अपनी आस्था के खिलाफ बताकर मारता हो। यह काम तो मनुष्य जैसा बुद्धिमान, तार्किक सोच रखने वाला प्राणी ही कर सकता है। वास्तव में मनुष्य के अलावा कोई अन्य प्राणी आस्था जैसी किसी चीज़ में कभी उलझता ही नहीं है और ना ही उलझने की ज़रूरत महसूस करता है।

मानव जाति के इतिहास में आज तक युद्ध, भूकंप, बाढ़, सुनामी आदि से उतने लोग नहीं मरे जितने धर्म और ईश्वर के नाम पर मरे है। फिर भी हम यह अक्सर सुनते है धर्म इसान क अच्छा बनाता है, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना आदि आदि। जबकि वास्तविकता यह है की धर्म ही सबसे जयादा नफरत फैलाता है।

जहाँ तक नैतिक मूल्यों का प्रश्न है, एक नास्तिक होने के नाते मैं यह कह सकता हूँ की धर्म का नैतिकता से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। अलबत्ता धार्मिक आस्था रखने वालो को अनैतिकता के मार्ग पर चलते हुए हम सबने देखा ही होगा क्यूंकि उनको पता होता है कि बुरे से बुरा काम भी करने पर भी भगवान के सामने मत्था टेक कर प्रायश्चित कर लिया जायेगा। वैसे भी अगर कोई व्यक्ति मात्र स्वर्ग प्राप्ति के लालच में या भगवान के डर के कारण अच्छा बन कर रहे तो वह अच्छाई भी तो खोखली ही हुई।

यदि गंभीरता से सोचा जाये तो देश में फैले इस भ्रष्टाचार के पीछे कहीं हमारी दान, दक्षिणा और चढ़ावे की संस्कृति ही तो ज़िम्मेदार नहीं? जहाँ लोगो को यह सिखाया जाता हो कि गंगा में एक डुबकी मारने से सारे पाप धुल जाते हैं वहां भला कोई पाप करने में क्यों संकोच करेगा। अब समय आ गया है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के दिमाग में जन्म से ही धर्म का ज़हर ना भरे। बच्चों को अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करने के लिए प्रेरित करे और उन्हें स्वयं यह तय करने दे कि वह धर्म या ईश्वर में विश्वास रखे या नहीं।

और अंत में शहीदे आज़म भगत सिंह द्वारा लिखा गया यह ऐतिहासिक लेख जिसे सभी को एक बार अवश्य पढ़ना एवं समझना चाहिए।

http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=879&pageno=1

Note- किसी की भावनाओ को आहत करना मेरे इस लेख का उद्देश्य कतई नहीं है। मैं तो भारत के संविधान में उल्लेखित उस मौलिक कर्त्तव्य का पालन कर रहा हूँ जो हमे वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने को कहता है।

Tuesday, 19 May 2015

प्रोटोकॉल के नाम पर



प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ दौरे पर बस्तर के कलेक्टर द्वारा धूप का चश्मा लगाये पीएम  की आगवानी करने पर प्रशासन विभाग द्वारा उनको नोटिस देना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बताता है की आज भी किस प्रकार उच्च नौकरशाही और राजनैतिक प्रधानो पर ओपनिवेशिक मानसिकता हावी है। किसी भी अधिकारी का मूल्यांकन उसके कर्त्तव्य पालन तथा सत्यनिष्ठ से होना चाहिए ना कि प्रोटोकॉल के नियमो पर। अखिल भारतीय सेवाओं के पद की गरिमा सम्बन्धी जिन आचरण नियमो का हवाला दिया जा रहा है वे स्वभाव से ही अस्पष्ट है तथा उसमे भी कही चश्मे का कोई ज़िक्र नहीं है।

वास्तव में सारी समस्या की जड़ में ये प्रोटोकॉल ही है जो कार्य निष्पादन के स्थान पर यह देखता है की छोटा अधिकारी बड़े अधिकारी के सामने कैसे आया या बड़ा अधिकारी मंत्री के समक्ष कैसे पेश आया और इन सारी औपचारिकताओं में वास्तविक कार्य पीछे छूट जाते है। सोचने वाली बात है कि यदि कोई कलेक्टर अपने क्षेत्र के दौरे पर है तो स्वाभाविक है की वह उसके अनुकूल पोशाक पहनकर ही घूमेगा। अब यदि ऐसे में कोई ‘माननीय’ उससे मिलने आ जाये तो क्या वह एक जोड़ी कपडे साथ में रखे ताकि प्रोटोकॉल के नियमो का पालन हो सके।

अब समय आ गया है कि हम इन ओपनिवेशिक परम्पराओं तथा प्रतीकात्मक मुद्दों से उपर उठकर अपना समय एवं उर्जा वास्तविक कार्य निष्पादन पर लगाये। वैसे भीं जब नौकरशाह और राजनेता दोनों ही लोक सेवक है तो उनके मध्य कैसा प्रोटोकॉल।

जब हम सुनते है कि प्रधानमन्त्री जी प्रोटोकॉल तोड़कर फलाने राष्ट्र के प्रमुख से मिले या जनता के बींच पहुच गए तब हम उनपर गर्व करते है, इसकी सराहना करते है पर जब कोई अधिकारी प्रोटोकॉल तोड़े तो इतना हंगामा किसलिए भाई? और जहाँ तक आचरण नियमो में उल्लेखित पद की गरिमा का प्रश्न है तो भला धूप का चश्मा लागाने से या किसी किसी खास रंग की शर्ट पहनने से पद की गरिमा कैसे प्रभावित हो सकती है। पद की गरिमा तो उन बेतुके बयानों से प्रभावित होती है हमारे सांसद, मंत्री सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिए यहाँ वहां देते फिरते है।

Also published on editorial page of Hindustan dated 19.05.2015

 http://epaper.livehindustan.com/story.aspx?id=305434&boxid=29167424&ed_date=2015-05-19&ed_code=1&ed_page=10




All rights reserved. Copyright © Anil Hasani

Wednesday, 13 May 2015

Magic of 1990s काश वो दिन लौट आते

उन सभी के लिए जिन्होंने अपना बचपन 1990-2000 के बींच गुज़ारा है।

वो दिन जब टीवी चैनल कम थे और एंटरटेनमेंट ज्यादा था। जब मोबाइल और इंटरनेट के बिना भी कम्युनिकेशन होता था। जब गर्मिया बिना कूलर, एयर कंडीशनर के निकल जाती थी और सर्दिया बिना हीटर के। जब फोटोग्राफ Kodak के कैमरे से लिए जाते थे और मोबाइल या फेसबुक पर नहीं बल्कि अपने निजी एल्बम में रखे जाते थे। जब घर में कलर टीवी होना तथा टेलीफोन कनेक्शन होना शान का विषय समझ जाता था। टेलीफोन नंबर के साथ PP लगा होना तो बड़ी सामान्य बात थी। जब सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल में लाइन में लग कर टिकट लेकर और पंखे की हवा खाते हुए फ़िल्म का मज़ा लिया जाता था जहाँ कोई गार्ड आपको घर से लाया हुआ खाने पीने का सामान अंदर ले जाने से रोकता नहीं था। जब पूरा परिवार एक स्कूटर पर समां जाता था और जब केवल किसी खास (बेहद खास) मौके पर ही बाहर रेस्टॉरेंट में खाना खाने का कार्यक्रम बनता था।

वीसीआर और टेप रिकॉर्डर का ज़माना। अपनी पसंद के गाने कैसेट में रिकॉर्ड करवाना। वीडियो गेम और कॉमिक्स के दिन। मई की तेज़ धुप में जब घर से बाहर निकलना संभव न हो तब चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव की कॉमिक्स का ही सहारा होता था और साथ ही कैरम, शतरंज, लूडो और बिज़नेस जैसे इनडोर गेम्स। वीडियो गेम से लेकर कॉमिक्स और यहाँ तक कि साइकिल भी घंटो के हिसाब से किराये पर मिलती थी। मुझे याद है जब हम कभी एक दिन के लिए वीडियो गेम लाते थे तो 24 घंटो में एक एक मिनट का पैसा वसूलते थे।☺

केबल टीवी तो खैर गर्मियों की छुट्टियों में ही नसीब होती थी (ऐसी मान्यता थी की इससे पढाई पर बुरा असर पड़ता है ☺)। बाकी साल तो दूरदर्शन देख कर ही निकलता था। अब समझ आया कि दूरदर्शन का वह समय टीवी सीरियलों की गुणवता की दृष्टि से स्वर्णिम युग था। उस समय प्रसारित होने वाले कार्यक्रम जैसे ब्योमकेश बक्शी, तहकीकात, फ्लॉप शो, मालगुडी डेज, जंगल बुक आदि की अपनी एक क्लास थी। यह वो वक्त था जब तरंग और टर्रमटू जैसे कार्यक्रम से भी टाइम पास हो जाता था। आज सिर्फ फिल्मो के ही कम से कम 20 चैनल आते है जिन पर रोज़ाना सैकड़ो फिल्में आती है पर जो इंतज़ार तब दूरदर्शन पर सप्ताह में एक बार आने वाली फ़िल्म के लिए होता था वो आज नदारद है। और फिर ' रूकावट के लिए खेद है' को भला कौन भूल सकता है।

जब बिना इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स के भी ज़िन्दगी बहुत आसान हुआ करती थी। जब किसी भी वस्तु को खरीदने का निर्णय उसकी कीमत और अपनी ज़रूरत के आधार पर लिया जाता था न की उसकी ब्रांड वैल्यू पर। उन दिनों भारत में उपभोक्तावादी संस्कृति पूरी तरह से विकसित नहीं हुई थी। आज वो दिन वापस तो नहीं आ सकते पर कुछ तस्वीरें हैं जो आज भी 1990s की याद ताज़ा कर देती हैं।





All rights reserved. Copyright © Anil Hasani


Thursday, 7 May 2015

अपराध की उम्र

किशोर न्याय कानून में होने वाले संशोधन के अंतर्गत जघन्य अपराधो के लिए आयु सीमा 18 से घटाकर 16 करने के प्रस्ताव को लेकर बहस जारी है। विभिन्न सामाजिक संगठन बाल अधिकारों तथा उससे सम्बंधित अंतर्राष्ट्रीय संधियों का हवाला दे रहे हैं। पर इन्ही संधियों पर हस्ताक्षर करने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अनेक यूरोपीय देशो में भी अपराध की बर्बरता और गंभीरता को देखते हुए 18 वर्ष से कम आयु वालो पर भी सामान्य अदालत में मुक़दमा चलने का प्रावधान किया गया है।

यह समझना मुश्किल है कि जो व्यक्ति बलात्कार जैसा अपराध करने की शारीरिक एवं मानसिक परिपक्वाता रखता है उसे किस आधार पर मासूम किशोर माना जा सकता है। केवल इसलिए कि वह 18 वर्ष की निर्धारित आयु सीमा से कुछ दिन या महीने छोटा है।

बेहतर यह होगा कि एक न्यूनतम आयु सीमे जैसे 10 या 12 वर्ष( जैसा की अमेरिका तथा फ्रांस आदि देशो में हैं) तथा एक ऊपरी सीमा जैसे 18 वर्ष निर्धारित की जाए। अब इस आयु वर्ग में आने वाले अपराधियो पर किये गए अपराध की गंभीरता के आधार पर मुक़दमा चले।

देखा जाए तो किसी भी अपराध की प्रवृति के आधार पर ही यहाँ तय किया जा सकता है कि दोषी पर मुक़दमा सामान्य न्यायलय में चलना चाहिए या किशोर न्यायलय में। अपराधी को दंड देने का एक उद्देश्य संभावित अपराधियों में कानून का भय पैदा करना भी है। वर्ना फिर कोई साढ़े सत्रह साल का 'मासूम' बलात्कार एवं हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बाद भी किशोरे कारावास में अधिकतम 3 साल गुजार कर खुले आम घूमता रहेगा और न्याय व्यवस्था का मजाक उडाता रहेगा।
Also published on editorial.page of Jansatta and Hindustan newspaer of 30.04.2015

http://epaper.jansatta.com/490852/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-01052015?show=touch#page/6/2




http://epaper.livehindustan.com/story.aspx?id=266300&boxid=84607796&ed_date=2015-05-01&ed_code=1&ed_page=10




Wednesday, 6 May 2015

सब्सिडी किसके लिए

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा समर्थ लोगो से रसोई गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील करना ऊपरी तौर पर तो सराहनीय प्रतीत होता है परन्तु उसका व्यापक प्रभाव पड़ने की उम्मीद कम ही है। कारण कि जब जनता सांसदों एवं मंत्रियों को संसद की कैंटीन, आलीशान बंगले , टेलीफोन भत्ता तथा वीआईपी कोटे में रेल यात्रा इत्यादि में बिना हिचक सरकारी धन का इस्तेमाल करते हुए देखती है तो उनसे सब्सिडी छोड़ने की उम्मीद करना व्यर्थ ही है। राजस्व घाटे को कम करने की सोच अच्छी तो है पर एक आम आदमी के नज़रिए से देखा जाए तो उसे सांसदों, विधायको द्वारा अच्छी खासी तनख्वाह होने के बावजूद सरकारी खर्चे पर सुख भोगने के सामने स्वयं ली जाने वाली गैस सब्सिडी नगण्य ही मानी जाएगी.

वैसे भी हमारी जनता प्रत्येक क्षेत्र में 'माननीयो' का अनुसरण करती है तो मुफ्तखोरी में भला कैसे पीछे रह सकती है. हमारे नेतागण जिस प्रकार से अपनी सहूलियत के लिए आयकर दाताओं का पैसा फूकते है, वे जनता को सब्सिडी छोड़ने का आग्रह करने का नैतिक अधिकार खो चुके हैं। 

प्रधानमंत्री जी का जनता को गैस सब्सिडी छोड़ने की नसीहत देना और स्वयं संसद की कैंटीन का शाही खाना खाकर 29 रूपए का बिल भर कर चलते बनना अपने आप में विरोधाभासी है। भ्रष्टाचार के सामान ही उत्तरदायित्व की भावना भी सदैव उच्च स्तर से निम्न स्तर की तरफ प्रवाहित होती है l उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति अपनी कथनी से नहीं बल्कि करनी से ही जन मानस को सब्सिडी छोड़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

Also Published on editorial page of Jansatta Newspaper dated 05.05.2014 
http://epaper.jansatta.com/493218/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-05052015#page/6/2