Friday, 30 June 2017

आधुनिक सामंतवाद

पिछले दिनों हमारी वीआईपी संस्कृति पर दो परस्पर विरोधाभासी खबरे पढ़ने को मिली। गुजरात विधानसभा अध्यक्ष गांधीनगर के सिविल अस्पताल में आंखें चेक करवाने गए और गाड़ी गलत पार्किंग में लगा दी।  अब वहां मौजूद बेचारा गार्ड अपनी ड्यूटी से मजबूर था और अध्यक्ष महोदय को पहचानता भी नही था सो उसने उनको वहां से गाड़ी हटाने को कहा। सुबह शाम जी हुज़ूर सुनने वाले नेताजी भला यह गुस्ताखी कैसे बर्दाश्त करते। पहले तो उन्होंने अपने तरीके से उसको झड़प लगाई और फिर बाद में गार्ड को अपनी नॉकरी से भी हाथ धोना पड़ा। बात यही तक खत्म नही हुई। अस्पताल ने उस सुरक्षा एजेंसी का कॉन्ट्रैक्ट ही रद्द कर दिया। अब हॉस्पिटल वाले चाहे लाख सफाई दे कि इसका अध्यक्ष महोदय से कोई संबंध नही है पर कोई बच्चा भी यह सब समझ सकता है की यह सब किसके इशारों पर हुआ है। यह शायद हमारे महान लोकतंत्र के सामंतवाद का नया संस्करण है।

दूसरी खबर बंगलोर से आयी जहां एक ट्रैफिक इंस्पेक्टर ने माननीय राष्ट्रपति के काफिले के बीच एक एम्बुलेंस को निकलने का रास्ता दिया। इंस्पेक्टर के इस कदम की आम जनता से लेकर उच्च अधिकारियों सभी ने जम कर प्रशंसा की। एक तरफ बंगलोर वाली खबर जहां नई उम्मीद जगती है वही गांधीनगर की घटना डराती है।

असल मे इतने सालों की गुलामी हमारे अवचेतन मन पर ऐसी छाई है कि हम आज़ादी के 70 साल बाद भी इस प्रकार की घटनाओं को गंभीरता से नही लेते। आये दिन आम बातचीत में हम यह सुनते रहते है कि वो तो फलाने मंत्री या नेता का खास आदमी है और कोई भी काम चुटकियों में करा सकता है या फलाना आदमी बहुत जुगाड़ू है। दरअसल यह जुगाड़ू प्रवृति और जी हजूरी वाली संस्कृति  ही इस आधुनिक सामंतवाद की जड़ है। अपना उल्लू सीधा करने के लिए हम जान प्रतिनिधियों को इतना ऊपर चढ़ा देते हैं कि वो स्वयं के लिए विशिष्टता के स्थायी मापदंड गढ़ लेते हैं। इस मानसिक गुलामी से मुक्त होना ओपनिवेशिक गुलामी से आज़ाद होने से कही अधिक चुनोतीपूर्ण है।

जनसत्ता 30/06/2017 में प्रकाशित

http://www.jansatta.com/chopal/chaupal-modern-feudalism/361955/




Sunday, 19 March 2017

कौन खोलेगा पोल

अभी कुछ समय पूर्व सीमा सुरक्षा बल के कांस्टेबल श्री तेज बहादुर यादव ने सोशल मीडिया पर विडियो के माध्यम से सैनिको के दिए जा रहे घटिया खाने की पोल खोली  थी। विडियो जितनी तेजी से वायरल हुआ, सीमा सुरक्षा बल और रक्षा मंत्रालय में उतनी तेजी से सनसनी फैल गयी। भ्रष्टाचार का पर्दाफार करने वाले को सम्मान और सुरक्षा देने के बजाय उल्टा उस पर ही अनुशासनहीनता के आरोप लगाए गए। खाने की गुडवत्ता की दिखावटी जांच के साथ सैनिक के पुराने रिकॉर्ड निकालकर किसी भी प्रकार से उसे गैरज़िम्मेदार साबित करने की पुरजोर  कोशिश शुरू हो गई।

बी एस ऍफ़ के आला अधिकारियों ने नसीहत या यूँ कहे कि धमकी दी कि किसी भी प्रकार की समस्या अपने उच्च अधिकारी को बताई जाए। यह तो वैसी ही बात हो गयी जैसे कि चोर से ही जाकर चोरी की शिकायत करना। अब भला कोई  स्वयं के खिलाफ आरोप क्यों सुनेगा। एक  तरफ सरकार 24 घंटे सोशल मीडिया पर कपनी उपलब्धियां गिनाने से नहीं थकती, बार बार जनता से प्रतिक्रिया देने को कहा जाता है वही दूसरी और रक्षा मंत्री जी कहते हैं कि सैनिक अपनी शिकायते सोशल मीडिया पर न डाले क्योंकि विभागीय शिकायतों को तो दबाया जा सकता है पर सोशल मीडिया पर तो सारी जनता को पता चल जायेगा की सरकार  भ्रष्टाचार को लेकर कितनी गंभीर है।

खेद का विषय है कि जिन सैनिको की दुहाई देकर सरकार आम जनता को नोटेबन्दी से होने वाली सभी समस्याओं को झेलने की नसीहत देती है उन्ही सैनिको के राशन में होने वाले घपलों को हलके में लिया जा रहा है। यदि भ्रष्टाचार की पोल खोलने वालों को हतोत्साहित और प्रताड़ित करने का सरकार का यही रवैया रहा तो कोई भी व्यक्ति अपनी जान खतरे में डाल कर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा। इस प्रकार तेज बहादुर जैसे देशभक्तो ने जो आशा की एक छोटी सी लौ जलायी है वह भी बुझा दी जायेगी और हमारे बाबुओं और माननीयों को लूट की झूली छूट मिल जायेगी।

जनसत्ता 08 मार्च 2017

http://www.jansatta.com/chopal/chaupal-will-open-poll-health-question/270468/